शरिया समेत कोई भी पर्सनल लॉ बाल विवाह कानून से ऊपर नहीं : इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
No personal law, including Sharia, is above the law on child marriage: Allahabad High Court's major decision

न्यूज़ इन्वेस्टिगेशन
✒️ विलोक पाठक
प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और अचल सचदेव की खंडपीठ ने बुलंदशहर में दर्ज एक एफआईआर को रद्द करने की मांग वाली 19 लोगों की रिट याचिका खारिज करते हुए बाल विवाह को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाने के साथ स्पष्ट किया है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरिया) सहित देश का कोई भी पर्सनल लॉ बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 (PCMA) और पॉक्सो अधिनियम, 2012 (POCSO Act) के प्रावधानों से ऊपर नहीं हो सकता। अदालत ने कहा कि भारत में विवाह की न्यूनतम कानूनी आयु सभी नागरिकों के लिए समान रूप से लागू है और किसी भी व्यक्तिगत कानून के आधार पर बाल विवाह को वैध नहीं ठहराया जा सकता।
खंडपीठ ने यह भी कहा कि PCMA और POCSO जैसे कानून जनहित, वैज्ञानिक समझ और राष्ट्रीय नीति पर आधारित हैं। ऐसे में किसी भी समुदाय या व्यक्ति को इन कानूनों से छूट नहीं दी जा सकती।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि 18 वर्ष से कम आयु की लड़की का विवाह कराना बाल विवाह निषेध अधिनियम का उल्लंघन है। ऐसे विवाह के बाद स्थापित होने वाले शारीरिक संबंध पॉक्सो अधिनियम के तहत अपराध की श्रेणी में आएंगे। इसलिए किसी भी पर्सनल लॉ का हवाला देकर इन कानूनों से राहत नहीं ली जा सकती।
यह मामला बुलंदशहर में एक 16 वर्षीय नाबालिग मुस्लिम लड़की का निकाह रुकवाने पहुंची पुलिस और चाइल्ड लाइन की रेस्क्यू टीम पर कथित हमले तथा सरकारी कार्य में बाधा डालने से संबंधित है। अदालत ने पुलिस और चाइल्ड लाइन की कार्रवाई की सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने संभावित अपराध को रोकने के लिए अपना वैधानिक दायित्व निभाया।
प्रथम दृष्टया एफआईआर में सरकारी कार्य में बाधा सहित गंभीर अपराधों के पर्याप्त आधार पाए जाने पर हाई कोर्ट ने एफआईआर रद्द करने से इनकार करते हुए 19 आरोपियों की याचिका खारिज कर दी। यह फैसला रूबी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले की सुनवाई के दौरान सुनाया गया।
Vilok Pathak
NEWS INVESTIGATION “The Real Truth Finder”


