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आखिर क्यों लेनी पड़ी भूमि समाधि , सिहोरा की जिला मांग के पीछे जनता का आक्रोश

*Why did the land burial have to be done – Public anger behind the demand for a district in Sihora*

न्यूज़ इन्वेस्टीगेशन

सिहोरा को जिला बनाने की मांग कोई नई नहीं है, बल्कि यह आंदोलन वर्षों से चलता आ रहा है। बार-बार आश्वासन मिलने के बावजूद अब तक प्रशासनिक स्तर पर कोई ठोस कदम न उठाए जाने से लोगों का सब्र टूट चुका है। इसी निराशा और उपेक्षा की भावना ने जनता को *भूमि समाधि सत्याग्रह* जैसा चरम कदम उठाने पर मजबूर कर दिया।

जनता की आवाज़ नहीं सुनी गई आंदोलनकारियों का कहना है कि सिहोरा के पास जिला बनने के सभी मानक मौजूद हैं — भौगोलिक स्थिति, जनसंख्या, राजस्व क्षमता, ऐतिहासिक महत्व और सरकारी कार्यालयों की उपलब्धता। बावजूद इसके, सिहोरा को जिला घोषित करने की मांग हर बार अनसुनी कर दी गई।

*शांतिपूर्ण आंदोलनों का नहीं मिला परिणाम* लक्ष्य जिला सिहोरा आंदोलन समिति के अनुसार, अब तक कई बार रैलियाँ, धरने, ज्ञापन और शांतिपूर्ण प्रदर्शन किए गए, लेकिन सरकार की ओर से सिर्फ आश्वासन ही मिले। आंदोलनकारियों का कहना है कि —

“जब लोकतांत्रिक तरीके से की गई हर पहल को नज़रअंदाज़ किया गया, तो हमें अपनी आवाज़ बुलंद करने के लिए भूमि समाधि जैसा कदम उठाना पड़ा।”

*संदेश यह है कि सिहोरा की जनता अब पीछे नहीं हटेगी* भूमि समाधि सत्याग्रह का उद्देश्य सरकार को यह दिखाना है कि सिहोरा के लोग अपनी मांग के लिए त्याग और संघर्ष दोनों करने को तैयार हैं। आंदोलनकारियों का कहना है कि अब यह लड़ाई सिर्फ जिला बनने की नहीं, बल्कि सम्मान और हक की लड़ाई है।

जनता की अपेक्षाएँ और सरकार की चुप्पी

सिहोरा की जनता लंबे समय से उम्मीद लगाए बैठी है कि सरकार उनकी भावनाओं को समझेगी और सिहोरा को जिला बनाकर इस संघर्ष का अंत करेगी। क्षेत्रवासियों का कहना है कि सिहोरा न सिर्फ भौगोलिक रूप से उपयुक्त है, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यापार और परिवहन की दृष्टि से भी एक पूर्ण जिला बनने की क्षमता रखता है।

फिर भी, सरकार की लगातार चुप्पी और अनदेखी ने आम नागरिकों को हताश कर दिया है। यही कारण है कि अब सिहोरा वासी यह संदेश देना चाहते हैं कि

 “अगर सरकार हमारी बात नहीं सुनेगी, तो हम मिट्टी में समा कर भी अपनी आवाज़ उठाएंगे।”

 

आंदोलनकारियों का कहना है कि भूमि समाधि सत्याग्रह प्रतीक है उस अनदेखे संघर्ष का, जो सिहोरा के लोग दशकों से लड़ रहे हैं। अब यह आंदोलन सिर्फ एक मांग नहीं, बल्कि सिहोरा की अस्मिता का प्रतीक बन गया है।

कल प्रशासन ने भरे थे गड्ढे, अब नया स्थान तय
जानकारी के अनुसार, सत्याग्रह के लिए पूर्व में तैयार किए गए गड्ढों को प्रशासन ने भरवा दिया था, जिससे आंदोलन पर संकट के बादल मंडरा गए थे। हालांकि समिति ने तुरंत नया स्थान तय कर लिया और घोषणा की कि आंदोलन किसी भी हालत में रद्द नहीं होगा।

नेताओं ने किया जनसमर्थन का आह्वान
समिति के सदस्य — विकास दुबे, अनिल जैन, कृष्ण कुमार कुररिया, मानस तिवारी, रामजी शुक्ला, संतोष पांडे, संतोष वर्मा, संजय पाठक, आशीष भार्गव, नीतीश खरया, जितेंद्र श्रीवास, राजेश कुररिया और सुशील जैन — ने सभी सिहोरा वासियों से बाहयनाला सिहोरा के समीप पहुंचकर आंदोलन में शामिल होने की अपील की है।

स्थानीय नागरिकों ने कहा कि यह आंदोलन सिहोरा के सम्मान और पहचान की लड़ाई है, और जब तक सिहोरा को जिला नहीं बनाया जाता, तब तक यह संघर्ष जारी रहेगा।

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