लाइफ स्टाइल

BBA चायवाला बना आत्मनिर्भरता की मिसाल, युवाओं के लिए बना प्रेरणा स्रोत

 न्यूज़ इन्वेस्टिगेशन

प्राची अनामिका मिश्रा

सिहोरा (जबलपुर)- मध्यप्रदेश के जबलपुर जिले के खितौला निवासी टेलर के बेटे सैंकी नामदेव ने यह साबित कर दिया कि हालात चाहे जैसे भी हों, अगर हौसला और मेहनत साथ हो तो आत्मनिर्भरता की राह जरूर निकलती है। पढ़ाई के साथ चाय की दुकान चलाकर सैंकी आज कई युवाओं के लिए प्रेरणा बन चुके हैं।
खितौला बाजार वार्ड क्रमांक 15 निवासी 21 वर्षीय सैंकी नामदेव, पिता पुरुषोत्तम नामदेव, दोनों ही दिव्यांग हैं। बारहवीं के बाद रोजगार की तलाश में सैंकी ने आईटीआई, ड्रोन टेक्नीशियन और सी++ जैसे कई डिप्लोमा और प्रशिक्षण लिए, लेकिन स्थायी और सम्मानजनक रोजगार नहीं मिल सका। इसके बावजूद उन्होंने पढ़ाई से हार नहीं मानी और जबलपुर के एक कॉलेज से बीबीए (बैचलर ऑफ बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन) में दाखिला ले लिया।

पढ़ाई के साथ शुरू की चाय की दुकान

दिन में बीबीए की कक्षाओं में शामिल होने के बाद सैंकी शाम को सिहोरा सिविल कोर्ट के पास चाय और मैगी का काउंटर लगाते हैं। आर्थिक स्थिति सुधारने और परिवार पर बोझ कम करने के लिए उन्होंने कम पूंजी में अपना यह छोटा व्यवसाय शुरू किया।

BBA हाफ चायवाला’ से मिली पहचान

शुरुआत में ग्राहकों की कमी रही, लेकिन सैंकी ने हिम्मत नहीं हारी। पहले दिन कम चाय बिकी तो उन्होंने खुद लोगों के पास जाकर चाय ऑफर की। जब काम चलने लगा तो बेहतर पहचान और मार्केटिंग के लिए दुकान का नाम रखा — ‘BBA हाफ चायवाला’, जिसे लोग आज ‘BBA चायवाला’ के नाम से जानते हैं। धीरे-धीरे उनका यह अनोखा आइडिया लोगों को पसंद आने लगा और दुकान की पहचान बनने लगी।

पिता से मिली प्रेरणा

सैंकी बताते हैं कि उन्हें प्रेरणा अपने पिता की सिलाई की छोटी दुकान से मिली। उन्होंने सीखा कि कोई भी काम छोटा नहीं होता, बस उसे ईमानदारी और मेहनत से करना चाहिए। इसी सोच के साथ सैंकी ने पढ़ाई के साथ-साथ पार्ट-टाइम काम किया ताकि पिता पर आर्थिक बोझ न पड़े।

युवाओं के लिए मिसाल

पैर से दिव्यांग होने के बावजूद सैंकी लगातार शिक्षा से जुड़े रहे और आज बीबीए द्वितीय वर्ष में अध्ययनरत हैं। बिना किसी सरकारी, सामाजिक या जनप्रतिनिधि की सहायता के उन्होंने खुद के दम पर अपना व्यवसाय खड़ा किया है। उनकी यह यात्रा आज के पढ़े-लिखे बेरोजगार युवाओं के लिए एक प्रेरणास्रोत बन गई है।
सैंकी का कहना है कि पिता की सीमित आय के कारण बड़ा व्यापार संभव नहीं था, इसलिए उन्होंने छोटे स्तर से शुरुआत की। आज लोगों का प्यार और सहयोग उन्हें मिल रहा है और वे आत्मनिर्भरता की ओर मजबूती से आगे बढ़ रहे हैं।

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