“मुख्यमंत्री जी, आखिर कब होगी फ्लाइंग प्रभारी और भ्रष्टाचार को पोसने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई ?”
“Chief Minister, when will action be taken against the flying in-charge and the officers who nurture corruption?”

न्यूज़ इन्वेस्टिगेशन
जबलपुर। मध्यप्रदेश के जबलपुर से परिवहन विभाग में कथित भ्रष्टाचार, अवैध वसूली और अनियमितताओं के गंभीर आरोपों को लेकर उठी एक आवाज जो अब सिस्टम को कटघरे में खड़ा कर रही है। परिवहन विभाग में कथित भ्रष्टाचार, अवैध वसूली और अनियमितताओं के गंभीर आरोपों के बीच सबसे बड़ा और सीधा सवाल यही है—“सीएम साहब, आखिर कार्रवाई कब होगी?”
मामला अब केवल विभागीय लापरवाही तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह सिस्टम की कार्यप्रणाली, जवाबदेही और पारदर्शिता पर बड़ा प्रश्नचिह्न बन चुका है। अधिवक्ता धर्मराज सिंह द्वारा लगातार की गई शिकायतें, दस्तावेजी साक्ष्य और बार-बार अधिकारियों को दी गई जानकारी के बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई सामने नहीं आई है।
सबसे ज्यादा सवाल परिवहन आयुक्त की भूमिका को लेकर उठ रहे हैं। आरोप है कि उन्हें पूरे मामले की विस्तृत जानकारी दी गई—यहां तक कि मोबाइल और व्हाट्सएप के माध्यम से भी प्रमाण भेजे गए—लेकिन न तो कोई जवाब दिया गया और न ही कोई निर्णायक कदम उठाया गया।
इस बीच 25 मार्च 2026 को लोकायुक्त संगठन द्वारा की गई कार्रवाई ने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया। परिवहन विभाग से जुड़े एक आरक्षक और निजी व्यक्ति को कथित रूप से रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़ा गया। यह घटना इस बात का संकेत है कि भ्रष्टाचार केवल आरोप नहीं, बल्कि जमीनी हकीकत बन चुका है।
इसके बावजूद, जिन अधिकारियों की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए थी, वे अब भी कार्रवाई से दूर हैं। फ्लाइंग प्रभारी राजेंद्र साहू पर लगे आरोप—अनाधिकृत व्यक्तियों को शासकीय कार्रवाई में शामिल करना, निजी लोगों के माध्यम से वसूली कराना और राजस्व को नुकसान पहुंचाना—अब भी बिना किसी ठोस जांच के अधर में लटके हुए हैं।
प्रशासनिक गलियारों में अब यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या यह केवल देरी है, या फिर किसी बड़े संरक्षण का संकेत? जब निचले स्तर पर कार्रवाई हो जाती है, लेकिन शीर्ष स्तर पर बैठे अधिकारी चुप रहते हैं, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या सिस्टम खुद अपने ही खिलाफ कार्रवाई करने से बच रहा है?
अधिवक्ता धर्मराज सिंह ने अब इस पूरे मामले को सीधे मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव तक पहुंचा दिया है। उन्होंने उच्चस्तरीय स्वतंत्र जांच, दोषियों की पहचान और सख्त कार्रवाई की मांग की है। साथ ही यह भी सवाल उठाया है कि जब परिवहन आयुक्त स्तर पर ही कार्रवाई नहीं हो रही, तो आम नागरिक न्याय की उम्मीद किससे करे?
यह मामला अब केवल जबलपुर तक सीमित नहीं रहा—यह पूरे प्रदेश के प्रशासनिक सिस्टम की विश्वसनीयता की परीक्षा बन चुका है। जनता के मन में एक ही सवाल गूंज रहा है—
क्या भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति सिर्फ कागजों में है?
क्या जिम्मेदार अधिकारी जवाबदेही से बचते रहेंगे?
और सबसे बड़ा सवाल—सीएम साहब, आखिर कार्रवाई कब होगी?




