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इंग्लिश मीडियम की वजह से बच्चे छोड़ रहे सरकारी स्कूल, बढ़ रहा निजी स्कूलों का रुझान

न्यूज़ इन्वेस्टिगेशन /  न्यूज़ डेस्क / प्राची

✒️  शहर हो या गांव, अभिभावकों की सोच में बड़ा बदलाव देखा जा रहा है। बच्चों के उज्ज्वल भविष्य और बेहतर अंग्रेजी शिक्षा और बाद में अच्छा रोजगार पाने की उम्मीद में अब माता-पिता उन्हें सरकारी स्कूल नहीं, बल्कि निजी स्कूलों में दाखिला दिला रहे हैं। इसका प्रमुख कारण बन रही है – इंग्लिश मीडियम शिक्षा प्रणाली। साथ ही निजी स्कूलों में केवल जागरूक पालक ही बच्चों को पढा रहे हैं जिससे उनका शिक्षा का स्तर भी अच्छा रहता जबकि शासकीय विद्यालय में बच्चों का दाखिला होने के बाद अधिकतर पालक बच्चे की जिम्मेदारी से मुक्त होना समझते हैं।

शिक्षाविदों का मानना है कि सरकारी स्कूलों में सुविधाओं की कमी, अंग्रेज़ी माध्यम में शिक्षा की अनुपलब्धता और प्रतियोगी युग में अंग्रेज़ी भाषा की महत्ता ने बच्चों को निजी स्कूलों की ओर मोड़ दिया है।

➡️बच्चों की संख्या में घटने की वजह
जहां एक ओर शासकीय स्कूलों में हिंदी माध्यम ही चल रहा है जो रोजगार के लिए वर्तमान नकाफी साबित हो रहा और पालक अंग्रेजी माध्यम में भेज रहे। वहीं यह भी देखा जा सकता है कि लगभग हर दूसरे- तीसरे गांव में भी अंग्रेजी माध्यम के निजी स्कूलों को मान्यता दी गयी है और संचालित हो रहे जबकि इनमे से तो कई स्कूल अपने मानक भी पूरे नही करते फिर भी चल रहे हैं और यही कारण है कि गांव में निजी स्कूल होने की वजह से पालक इन्ही स्कूलों में भेजने सही समझते हैं और शासकीय स्कूल में दर्ज संख्या घटती जा रही है।
राज्य के शिक्षा विभाग के आंकड़ों के अनुसार, पिछले 5 वर्षों में सरकारी स्कूलों में छात्रों की संख्या में काफी गिरावट आई है, जबकि निजी स्कूलों में दाखिले बढ़ते जा रहे हैं। ग्रामीण इलाकों में भी यह बदलाव तेजी से देखा जा रहा है, जहां पहले सरकारी स्कूल ही एकमात्र विकल्प हुआ करते थे।

➡️अभिभावकों की राय

एक अभिभावक अशोक मिश्रा, दिनेश मिश्रा बरगी निवासी, डब्बू पाठक सिहोरा, सुनील साहू सिहोरा बताते हैं, कि “हम चाहेंगे कि हमारे बच्चे भी अच्छे अंग्रेज़ी स्कूल में पढ़ें ताकि भविष्य में किसी नौकरी या प्रतियोगिता में पीछे न रहें। लेकिन सरकारी स्कूल अंग्रेजी वाला ऐसा माहौल नहीं है।” जिससे निजी स्कूलों में भेजना पड़ रहा है।

➡️शिक्षकों की चिंता

सरकारी स्कूलों के शिक्षक इस प्रवृत्ति को चिंताजनक मानते हैं। एक शिक्षक का कहना है, “हमारे पास योग्य स्टाफ और संसाधन की कमी नही है। इंग्लिश मीडियम की मांग को पूरा करना वर्तमान सरकारी ढांचे में संभव नहीं दिखता।”

➡️सरकार की कोशिशें, पालक की मजबूरी

राज्य सरकार ने इस प्रवृत्ति को रोकने के लिए कुछ स्कूलों में अंग्रेजी माध्यम की कक्षाएं शुरू करने की घोषणा की है, जिनमे संदीपनी विद्यालय में प्राथमिक कक्षाओं से अंग्रेजी माध्यम शुरू भी हुआ है जबकि यह स्कूल हर जगह उपलब्ध नही होने की वजह से बच्चे आज भी निजी स्कूल जाने मजबूर हो रहे। साथ ही “कॉन्वेंट- जैसा वातावरण” देने की भी बात कही गई है। परंतु ज़मीनी स्तर पर बदलाव की रफ्तार बहुत धीमी है। जबकि शासन के कुछ नुमाइंदे इस बात पर जोर देते हैं कि सरकारी विद्यालय में शिक्षा का स्तर नही बचा, जबकि हकीकत यह है कि जो जागरूक पालक हैं वह न चाहते हुए भी केवल अंग्रेजी माध्यम के लिए निजी स्कूलों में बच्चे भेज रहे हैं, जिससे दर्ज संख्या स्कूलों में कम हुई है।

➡️रोजगार पाने में अग्रेंजी की भूमिका
इंग्लिश मीडियम शिक्षा आज केवल स्टेटस सिंबल नहीं, बल्कि रोजगार पाने की ज़रूरत बन गई है। यदि सरकारी स्कूल इस बदलाव के साथ खुद को नहीं ढालते हैं, तो आने वाले कुछ वर्षों में इनकी स्थिति और भी कमजोर हो सकती है।जबकि यह देखा जाता है कि किसी भी ऑफिस वर्क या कंपनी में अंग्रेजी आने वाले लोगों को ही स्थान दिया जाता है। जबकि हिंदी माध्यम से लाखों युवा बेरोजगार हैं या किसी स्थानीय दुकानें में काम करने मजबूर हैं जिन्हें ढंग की मजदूरी भी नही पड़ती।

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